कागजी 'जादूगरी' से नियुक्ति धांधली दबाने का खेल! बलिया DIOS दफ्तर पर लगे गंभीर आरोप

बलिया के बांसडीह इंटर कॉलेज में परिचारकों और लिपिकों की भर्ती धांधली मामले में DIOS दफ्तर की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। आरोप है कि विकास कोष गबन की कोर्ट याचिका का गलत हवाला देकर IGRS पोर्टल पर दर्ज शिकायत को खारिज कर दिया गया। शिकायतकर्ता ने निष्पक्ष बहस और पुनः सुनवाई की मांग की है।

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जनवार्ता लाइव

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बलिया।

कागजों के जाल में उलझाकर गंभीर मामलों को ठंडे बस्ते में कैसे डाला जाता है, इसका नायाब नमूना देखना हो तो जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय बलिया चले आइए। बांसडीह इंटर कॉलेज में परिचारकों और लिपिकों के विवादित नियुक्ति प्रकरण में  पोर्टल पर दर्ज शिकायत का जो निस्तारण पेश किया गया है, उसने शिक्षा महकमे की कार्यशैली पर खड़े किए गए गंभीर सवालों को और हवा दे दी है।

मामला बांसडीह इंटर कॉलेज में हुई नियुक्तियों और पूर्व में तत्कालीन उप जिलाधिकारी (बांसडीह) अन्नपूर्णा गर्ग द्वारा गठित समिति की जांच रिपोर्ट से जुड़ा है। उस समय जांच में विकास कोष गबन और धांधली के गंभीर आरोप सामने आए थे। हालांकि, इसके इतर परिचारकों व लिपिकों के विवादित नियुक्ति प्रकरण के समाधान को लेकर आईजीआरएस पर अलग से शिकायत दर्ज कराई गई थी।

 

शिकायतकर्ता का कहना है कि पूर्व में सुनवाई के दौरान डीआईओएस कार्यालय ने अंतिम निस्तारण के लिए एक महीने का समय मांगा था और प्रकरण को अस्थायी रूप से निक्षेपित करने का आग्रह किया था। लेकिन एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जब कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो शिकायतकर्ता द्वारा पुनः आईजीआरएस पर शिकायत दर्ज कर त्वरित निस्तारण की मांग की गई।

 

पुनः शिकायत दर्ज होते ही डीआईओएस मनोज कुमार मिश्रा और दफ्तर के पटल बाबू ज्ञान प्रकाश मिश्रा व संजय कुमार यादव ने ऐसी 'जादूगरी' दिखाई कि शिकायतकर्ता भी दंग रह गये। आईजीआरएस पर लगाए गए निस्तारण आख्या में उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दाखिल एक याचिका को आधार बनाकर यह कह दिया गया कि मामला कोर्ट में विचाराधीन होने के कारण यह आईजीआरएस के क्षेत्राधिकार से बाहर है।

 

लेकिन असल पेंच यहीं फंसा है। सूत्र और उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि जिस याचिका का हवाला देकर मामला खारिज किया गया, उसका नियुक्ति प्रकरण से सीधे तौर पर कोई संबंध ही नहीं था! वह याचिका तो तत्कालीन एसडीएम अन्नपूर्णा गर्ग द्वारा 'विकास कोष गबन' की जांच रिपोर्ट के आधार पर होने वाली दंडात्मक कार्रवाई से बचने और स्टे पाने के लिए प्रबंधन द्वारा दाखिल की गई थी, जो पैरवी के अभाव में अटकी हुई है।

 

अब सवाल यह उठ रहा है कि 'विकास कोष गबन' की याचिका को 'नियुक्ति धांधली' का निस्तारण बनाते वक्त किसकी शह पर नत्थी किया गया? क्या डीआईओएस मनोज कुमार मिश्रा, पटल संभाल रहे ज्ञान प्रकाश मिश्रा और बाबू संजय यादव को इन दोनों फाइलों के फर्क की जानकारी नहीं थी? या फिर जान-बूझकर गलत याचिका का संदर्भ देकर फाइल बंद करने के लिए यह रास्ता चुना गया?

 

29 अगस्त की सुनवाई में केवल 'कागजी कोरम'

29 अगस्त 2026 को इस प्रकरण में सुनवाई बुलाई गई थी। शिकायतकर्ता का गंभीर आरोप है कि सुनवाई के दौरान उठाए गए प्रमुख कानूनी बिंदुओं, तथ्यों और नियमों का निस्तारण आख्या में उल्लेख तक नहीं किया गया। केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए प्रक्रिया चलाई गई और गलत याचिका का सहारा लेकर मामला 'निक्षेपित' कर दिया गया।

 

अब सवाल सीधे डीआईओएस मनोज कुमार मिश्रा की मंशा और मुख्य रूप से पटल देख रहे ज्ञान प्रकाश मिश्रा समेत संजय यादव की भूमिका पर उठ रहे हैं। क्या निष्पक्ष जांच से किसी खास पक्ष को बचाने के लिए यह पूरा जाल बुना गया। 

 

आर-पार के मूड में शिकायतकर्ता

इस पूरे फर्जीवाड़े और गलत तथ्यों पर आधारित निस्तारण के खिलाफ शिकायतकर्ता ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने जिला विद्यालय निरीक्षक से मांग की है कि गलत याचिका का संदर्भ देकर बंद किए गए इस प्रकरण में नई तारीख नियत कर आमने-सामने की निष्पक्ष बहस कराई जाए, ताकि नियुक्ति धांधली के इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। उक्त के।आधार पर स्लग,टाइटल, डिस्क्रिप्शन, कीवर्ड्स, टैग्स दे।