'भ्रष्टाचार की भी कोई मर्यादा होती है साहब!': बरेली के कस्तूरबा स्कूलों में मासूमों के निवाले और पैड पर डाका, DM की तल्ख लताड़ के बाद क्या दबेगी फाइल?

बरेली के 18 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों में छात्राओं को खाने और सैनिटरी पैड तक के लिए तरसाया जा रहा है। गोपनीय रिपोर्ट की समीक्षा में डीएम अविनाश सिंह ने बीएसए डॉ. विनीता और अधिकारियों को लताड़ लगाते हुए कहा कि 'लूट-खसोट की भी कोई मर्यादा होती है'। जानिए कैसे लेखाकारों की फर्जी फर्मों के जाल में फंसा है मासूमों का हक।

'भ्रष्टाचार की भी कोई मर्यादा होती है साहब!': बरेली के कस्तूरबा स्कूलों में मासूमों के निवाले और पैड पर डाका, DM की तल्ख लताड़ के बाद क्या दबेगी फाइल?
जनवार्ता लाइव

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बरेली।

सर्वशिक्षा अभियान और महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े विज्ञापनों की हवा निकालती एक कड़वी हकीकत बरेली के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों से सामने आई है। जिले में कुल 18 कस्तूरबा स्कूल कागजों पर तो 'बालिकाओं का भविष्य संवार' रहे हैं, लेकिन हकीकत में मासूमों को सैनिटरी पैड जैसी बुनियादी जरूरत और भरपेट भोजन तक के लिए तरसाया जा रहा है।

यह शर्मनाक खुलासा तब हुआ जब बीते दिनों शिकायतों और गोपनीय रिपोर्ट की समीक्षा खुद जिलाधिकारी अविनाश सिंह कर रहे थे। बैठक में बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ. विनीता, तमाम वार्डेन और अन्य विभागीय 'कर्णधार' मौजूद थे। बदहाली की परतें उधड़ीं तो गुस्से से तमतमाए डीएम साहब ने जिम्मेदार अधिकारियों के 'कर्तव्यनिष्ठ' आचरण पर तंज कसते हुए यहां तक कह दिया— "अरे हुजूर, लूट-खसोट की भी कोई मर्यादा और उसूल होते हैं!" यानी साहब का इशारा साफ था कि कम से कम इन बेसहारा बच्चियों के हक पर तो इस कदर बेशर्मी से डाका मत डालो।

गोपनीय जांच रिपोर्ट की मानें तो व्यवस्था के 'संरक्षकों' ने स्कूलों का यह आलम कर रखा है कि छात्राओं को न तो भरपूर सैनिटरी पैड नसीब हो रहे हैं और न ही साबुन-तेल जैसे जरूरी सामान। हद तो यह है कि सरकारी बजट डकारने वाले इन केंद्रों में मासूमों को दो वक्त का भरपेट भोजन देना भी अधिकारियों की 'उदारता' के बाहर की बात हो गई है।

कस्तूरबा गांधी विद्यालयों में यह 'कल्याणकारी कमाई का खेल' कोई नया नहीं है। पहले भी कई बार बड़े-बड़े खुलासे हुए, लेकिन हर बार नतीजे में जिम्मेदार अधिकारियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। चर्चा तो यह भी है कि हर खुलासे के बाद 'ऊपरी अनुकंपा' से फाइलें ठंडे बस्ते की शोभा बढ़ाने लगती हैं।

अगर इस बार मामले की उधेड़-बुन ठीक से हुई, तो कई और 'ईमानदार' चेहरे बेनकाब होंगे। सूत्रों के मुताबिक, ज्यादातर कस्तूरबा स्कूलों के लेखाकारों (अकाउंटेंट्स) ने अपने या अपने रिश्तेदारों के नाम पर ही फर्जी फर्में खोलकर आपूर्ति का पूरा ढांचा संभाल रखा है। ये लेखाकार वार्डेन पर दबाव बनाकर ठेकेदारी का खेल रचते हैं, और वार्डेन भी 'विभागीय सौहार्द' बनाए रखने के चक्कर में चुप रहने में ही भलाई समझती हैं।

: लेखा