नाश्ते का बिल सहारनपुर से और गोदाम 25 किमी दूर: बरेली कृषि विभाग में 'मिश्रा जी' का अनूठा 'विकास मॉडल'
बरेली के कृषि विभाग में रिश्वतखोरी का नया कारनामा सामने आया है। 50 हजार की घूस न देने पर बीज गोदाम 25 किमी दूर शिफ्ट कर दिया गया, वहीं किसान पाठशाला के नाश्ते का बिल सहारनपुर की फर्म से भुनाया जा रहा है।
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बरेली।
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झुमका गिरने के लिए मशहूर बरेली का नाम अब कृषि विभाग की मेहरबानी से 'भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान' गढ़ने के लिए चर्चा में है। नवागत उप निदेशक कृषि ओ.पी. मिश्र जी के आगमन पर किसानों और कर्मचारियों को लगा था कि अब व्यवस्था सुधरेगी, लेकिन नए साहब का 'प्रशासनिक पेट' इतना बड़ा निकला कि किसानों के बीज के साथ-साथ कर्मचारियों का हक भी डकार गए।
विभाग का गणित इतना दिलचस्प है कि दमखोदा का राजकीय बीज गोदाम रातों-रात 25 किलोमीटर दूर बहेड़ी भेज दिया गया। तर्क भले ही जर्जर भवन का दिया जाए, लेकिन चर्चा यही है कि देहात में सरकारी बीज बाजार में बेचने में दिक्कत आ रही थी, जबकि बहेड़ी में 'पलक झपकते ही' माल पार करने की पूरी सहूलियत है। अब 25 किमी दूर बीज लेने कौन किसान जाएगा—शायद यही सोचकर यह मास्टरस्ट्रोक खेला गया है।
सहारनपुर से नाश्ता और 1300 रुपये का 'साहबी कट'
भ्रष्टाचार का एक और नायाब नमूना 'किसान पाठशाला' में दिखा। पाठशाला कराने वाले कर्मचारी भुगतान के लिए भटक रहे हैं, क्योंकि 4000 रुपये के बजट में से 1300 रुपये सीधे साहब के खाते में चले गए। बाकी का हिस्सा फर्जी बिल सप्लाई करने वाली सहारनपुर की फर्म 'हिमांशू ट्रेडर्स' को थमा दिया गया और कर्मचारियों के हिस्से आए महज़ 1100 रुपये। अब आरोप तो यह भी हैं कि बरेली की पाठशाला में नाश्ता किसी स्थानीय दुकान से नहीं, बल्कि हवाई जहाज से सहारनपुर से मंगाया जा रहा है!
50 हजार की 'एंट्री फीस' और तबादला उद्योग
बताया जा रहा है कि हर गोदाम प्रभारी से साल में दो बार 50-50 हजार रुपये की 'सेवा राशि' मांगी गई थी। जब पुराने प्रभारियों ने हाथ खड़े कर दिए, तो 1 सितंबर को उन्हें पद से हटाकर नए प्रभारियों की तैनाती कर दी गई। इस 'डबल मुनाफे' के खेल से जहां अधिकारी गदगद हैं, वहीं कर्मचारी और किसान सिर पीट रहे हैं।
सबसे मजे की बात यह है कि लखनऊ में ईमानदारी का बोर्ड लगाकर बैठने वाले उच्च अधिकारियों और मंडल के संयुक्त कृषि निदेशक को सब कुछ दिख रहा है, लेकिन वे दफ़्तर में बैठकर मंद-मंद मुस्कुराने के अलावा कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। अब देखना यह है कि इस 'दाल-पात' के खेल पर शासन की नजर कब पड़ती है, या फिर किसान 25 किलोमीटर की दौड़ ही लगाते रहेंगे।