इतिहास और वास्तुकला का बेजोड़ संगम: जानिए राजसमंद झील और 'नौ चौकी पाल' की अनसुनी और रोचक बातें
राजस्थान की ऐतिहासिक राजसमंद झील और इसके उत्तरी तट पर स्थित 'नौ चौकी पाल' का इतिहास, विश्व प्रसिद्ध राज-प्रशस्ति और अकाल राहत से जुड़े रोचक तथ्य यहाँ पढ़ें।
जनवार्ता लाइव
राजसमन्द।
अरे भाई, क्या बताऊँ! जब भी इतिहास के पन्नों को पलटो, राजस्थान की जमीन से कोई न कोई ऐसी दास्तान निकल ही आती है जो दिल को छू ले। आज बात करते हैं एक ऐसी ही शानदार और अद्भुत जगह की—हमारी अपनी राजसमंद झील और इसके उत्तरी किनारे पर बनी 'नौ चौकी पाल' की।
जरा सोचिए, आज से करीब साढ़े तीन सौ साल पहले, जब टेक्नोलॉजी या बड़ी-बड़ी मशीनें नहीं थीं, तब मेवाड़ के महाराणा राज सिंह प्रथम ने 1662 से 1676 ईस्वी के बीच गोमती, केलवा और ताली नदियों के पानी को रोककर एक विशाल कृत्रिम झील खड़ी कर दी थी। और जानते हैं इसकी सबसे बड़ी खासियत क्या थी? यह सिर्फ पानी इकट्ठा करने के लिए नहीं बनाई गई थी। साल 1661-62 में जब भयंकर अकाल पड़ा था, तब आम जनता को रोजगार और राहत देने के लिए इस पर काम शुरू करवाया गया था। यानी यह प्राचीन जल प्रबंधन के साथ-साथ आपदा प्रबंधन का भी बेहतरीन उदाहरण है!
अब जरा इसके नाम और इसकी बनावट पर गौर करिए। इस पाल का नाम 'नौ चौकी पाल' यूं ही नहीं पड़ा है, यहाँ तो '9' अंक का गजब का जादुई संयोग देखने को मिलता है। यहाँ सफेद संगमरमर के 9 बेहद खूबसूरत मंडप (चौकी) बने हैं। झील तक उतरने के लिए सीढ़ियों के 9 समूह बनाए गए हैं, और सबसे मजेदार बात यह है कि हर एक सीढ़ी की ऊँचाई और चौड़ाई ठीक नौ इंच है!
यहीं पर दुनिया का सबसे बड़ा शिलालेख भी मौजूद है, जिसे 'राज-प्रशस्ति' कहते हैं। सफेद संगमरमर की 25 विशाल शिलाओं पर संस्कृत भाषा में पूरे मेवाड़ का इतिहास खुदा हुआ है। इसे रणछोडभट्ट तैलंग ने रचा था और यह आज भी उस दौर के वैभव की पूरी कहानी बयां करता है।
इस पाल पर सिर्फ इतिहास ही नहीं, बल्कि आस्था और बलिदान की अनूठी मिसालें भी दिखती हैं। यहाँ आपको माँ अम्बा का दस भुजाओं वाला प्रसिद्ध मंदिर तो मिलेगा ही, साथ ही घेवर माता का ऐतिहासिक मंदिर भी देखने को मिलेगा। कहते हैं कि जब इस बांध की नींव बार-बार गिर रही थी, तब गलता की एक महिला 'घेवर बाई' ने यहाँ सती होकर अपना बलिदान दिया था, जिसके बाद यह बांध सुरक्षित बन पाया। इसके अलावा यहाँ संगमरमर के तोरण भी हैं, जिन पर राजा-महाराणा अपने वजन के बराबर सोना तौलकर गरीबों और ब्राह्मणों को दान किया करते थे।
सचमुच, यह जगह इतिहास, कला और इंसानियत का एक ऐसा संगम है जहाँ हर पत्थर अपनी कोई न कोई कहानी कहता है!