रेलवे का गजब कारनामा: कर्मचारियों के घर टपक रहे हैं, और बाबू लोग गैर-मान्यता प्राप्त यूनियन के दफ्तर में मार्बल चमकाने में जुटे हैं!
पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर मंडल से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहाँ कर्मचारियों के आवासों के लिए 'बजट का रोना' रोया जा रहा है, वहीं नियमों को ताक पर रखकर एक गैर-मान्यता प्राप्त यूनियन कार्यालय में युद्धस्तर पर भव्य निर्माण कराया जा रहा है। जानिए कैसे रेलवे प्रशासन अपनी ही नीतियों को ठेंगा दिखा रहा है।
जनवार्ता लाइव
इज्जतनगर।
भारतीय रेलवे में विकास के पहिए भले ही धीमी गति से चल रहे हों, लेकिन चापलूसी और मेहरबानी की गाड़ी सुपरफास्ट एक्सप्रेस की रफ्तार से दौड़ती है। इसका ताजा और सबसे शर्मनाक उदाहरण पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर मंडल से सामने आया है, जहाँ रेल प्रशासन ने प्राथमिकताओं की परिभाषा ही बदल दी है। यहाँ आम कर्मचारियों के घरों की छतों से टपकता पानी प्रशासन को नजर नहीं आता, लेकिन एक खास (गैर-मान्यता प्राप्त) यूनियन के दफ्तर की शानो-शौकत बढ़ाने के लिए सरकारी खजाने का मुंह पूरी तरह खुला हुआ है।
बजट का रोना बनाम 'मरजी का बहाना
एक तरफ वे अभागे रेल कर्मचारी हैं जो अपनी खून-पसीने की कमाई से नियमित रूप से मकान किराया भत्ता कटवा रहे हैं। इन कर्मचारियों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे अपने आशियाने की छतों की मरम्मत या दीवारों की पुताई मांग बैठते हैं। जैसे ही कर्मचारी अपनी जायज़ मांग लेकर भोजीपुरा के इंस्पेक्टर ऑफ वर्क्स महोदय के पास पहुंचते हैं, इंजीनियर साहब ऐसा दर्द भरा राग अलापते हैं कि सुनने वाले की आंखें नम हो जाएं—"भाईसाहब, बजट नहीं है! रेलवे कंगाल हो चुकी है!"
कर्मचारी मायूस होकर लौट आते हैं, सोचते हैं कि शायद देश की अर्थव्यवस्था वाकई खतरे में है। लेकिन जरा ठहरिए! अ