पति पर FIR, अस्पताल में भर्ती और फिर चर्चाओं का बाज़ार गरम—क्या रेखा आर्य का यह कदम महज़ घरेलू कलह है या कोई सोची-समझी राजनीतिक चाल?

उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य द्वारा पति पर गंभीर आरोप लगाकर FIR दर्ज कराने के बाद सूबे की राजनीति में भूचाल आ गया है। इस सनसनीखेज मामले के पीछे क्या आगामी चुनाव और मंत्री पद बचाने का कोई पैंतरा है? जानिए पूरी रिपोर्ट..आखिर क्या है सच...

पति पर FIR, अस्पताल में भर्ती और फिर चर्चाओं का बाज़ार गरम—क्या रेखा आर्य का यह कदम महज़ घरेलू कलह है या कोई सोची-समझी राजनीतिक चाल?
जनवार्ता लाइव

सियासत का नया ड्रामा: घर की लड़ाई या चुनाव से पहले का 'मास्टरस्ट्रोक'?

जनवार्ता लाइव 

देहरादून।

उत्तराखंड के सियासी गलियारों में इन दिनों चाय की चुस्कियों के साथ एक ही चर्चा सबसे ऊपर है—राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य और उनके पति गिरधारी लाल साहू के बीच का यह ताजा घमासान। मंत्री जी ने देहरादून के कैंट कोतवाली में अपने ही पतिदेव के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज करवा दी है। आरोप इतने भारी-भरकम हैं कि अच्छे-अच्छे थ्रिलर उपन्यासों के प्लॉट भी फीके पड़ जाएं!

आरोपों की लंबी फेहरिस्त

रेखा आर्य ने आरोप लगाया है कि साल 2004 में जब उनका ब्याह हुआ था, तब पति महोदय ने अपनी 'पहली शादी' का सीक्रेट बड़े करीने से छिपा कर रखा था। यानी मामला सीधे-सीधे 'धोखा, फरेब और लुका-छिपी' के बॉलीवुड स्टाइल ट्रैक पर चल रहा है। इसके अलावा मारपीट, जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल, फर्जी साइन कर पदों से हटाने और जान से मारने की धमकियों तक के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अब मंत्री जी ने ऑडियो रिकॉर्डिंग का हवाला देकर खुद और बच्चों की सुरक्षा की गुहार लगाई है, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर आई और वे अस्पताल में भर्ती हो गईं।

जनता के मन का बड़ा सवाल: क्या यह महज़ घरेलू कलह है या कोई राजनीतिक स्टंट?

जैसे ही यह मामला सार्वजनिक हुआ, उत्तराखंड की जनता और विरोधी दलों के कान खड़े हो गए हैं। आखिर चुनाव के मुहाने पर खड़े इस सूबे में अचानक यह घरेलू घमासान बाहर क्यों आया?

चर्चाओं के बाज़ार में तो यह कयास भी बड़े ज़ोर-शोर से लगाए जा रहे हैं कि "कहीं यह आने वाले चुनावों की बिसात बिछाने या मंत्री पद की कुर्सी बचाने का कोई अचूक सियासी पैंतरा तो नहीं?"

भारतीय राजनीति में जब भी घर के भीतर के झगड़े इतने नाटकीय तरीके से सड़क और थाने तक पहुंचते हैं, तो जनता का शक सुई की तरह घूमकर इस बात पर टिक जाता है कि—भैया, दाल में कुछ काला है या पूरी दाल ही काली है? कई सियासी पंडित दबी जुबान में यह भी कह रहे हैं कि चुनाव नजदीक आते ही सहानुभूति बटोरने या हवा का रुख मोड़ने के लिए ऐसे 'मास्टरस्ट्रोक' अक्सर खेले जाते हैं।

फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर अपनी जांच शुरू कर दी है। आरोपों में कितनी सच्चाई है और किसके दावों में कितना दम, यह तो खाकी और कानून की जांच के बाद ही साफ होगा। लेकिन तब तक उत्तराखंड की यह हाई-प्रोफा