रसूख के गुब्बारे में लगी कानून की पिन: 16 लाख डकारने वाली पूर्व BSA साहिबा के 'मगरमच्छी' आंसू!
देवरिया की निलंबित बीएसए शालिनी श्रीवास्तव को कुशीनगर के शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह की आत्महत्या मामले में दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया है। उन पर ट्रांसफर के नाम पर 16 लाख रुपये घूस लेने का सनसनीखेज आरोप है। जानिए कैसे भ्रष्टाचार के नशे में चूर एक अधिकारी का सारा रसूख कानून के सामने ढह गया।
जनवार्ता लाइव
बरेली।
कहते हैं 'कर्म' के रेस्टोरेंट में कोई मेन्यू नहीं होता, आपने जो पकाया है, वही आपको खाना पड़ता है। देवरिया की पूर्व बीएसए शालिनी श्रीवास्तव ने भी अपने लिए 'भ्रष्टाचार का जो शाही पकवान' तैयार किया था, अब जेल की सलाखों के पीछे उसी का स्वाद चख रही हैं। जो कलम कभी एक झटके में सैकड़ों शिक्षकों का भविष्य तय करती थी, आज वो खुद की जमानत की अर्जी लिखने के काम भी नहीं आ रही।
गाजीपुर में एक सम्मानित प्रधानाचार्या से देवरिया की बीएसए बनने तक का सफर शालिनी जी के लिए किसी कॉरपोरेट 'सक्सेस स्टोरी' से कम नहीं था। पदभार ग्रहण करते ही स्वागत में फूल-मालाएं और बधाइयों का शोर था, लेकिन मैडम ने सरकारी पद को 'वसूली का स्टार्टअप' बना दिया। कुशीनगर के सीधे-साधे सहायक अध्यापक कृष्ण मोहन सिंह से ट्रांसफर और विभागीय काम के नाम पर 16 लाख रुपये का भारी-भरकम 'चंदा' ऐंठ लिया गया। क्लर्क संजीव सिंह के साथ मिलकर चलाए जा रहे इस सिंडिकेट का पेट इतने से भी नहीं भरा, तो 4 लाख का 'शगुन' और मांग लिया गया। इस सरकारी लालच और मानसिक प्रताड़ना को न झेल पाने के कारण 20 फरवरी 2026 को उस बेबस शिक्षक ने मौत को गले लगा लिया और जाते-जाते सुसाइड नोट में इस 'भ्रष्टाचार प्राइवेट लिमिटेड' की पूरी बैलेंस-शीट दुनिया के सामने खोल दी।
शिक्षक की मौत के बाद मैडम का चार महीने का 'अंडरग्राउंड' टूर शुरू हो गया, जो अंततः दिल्ली में गोरखपुर पुलिस के हत्थे चढ़ने पर खत्म हुआ। गिरफ्तारी के वक्त जो नजारा दिखा, वह कुर्सी के नशे में चूर किसी भी घमंडी अधिकारी के लिए एक मुफ्त मास्टरक्लास है। जिन कदमों में कभी अफसरशाही का गुरूर था, वे दिल्ली में पुलिस को देखकर कांपने लगे। कोर्ट रूम में मजिस्ट्रेट के सामने तो आंसुओं की ऐसी अविरल गंगा बही कि शायद 16 लाख का हिसाब भी उसमें धुल जाए। जो हाथ कभी बेहिचक लाखों के लिफाफे पकड़ते थे, वे पुलिस के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहे थे।
शालिनी श्रीवास्तव का यह 'अर्श से फर्श' तक का सफर हर उस बाबू और अधिकारी के लिए एक कड़ी चेतावनी है, जिसे लगता है कि सरकारी कुर्सी उनकी पुश्तैनी जागीर है। कुर्सी का नशा शराब से भी ज्यादा खतरनाक होता है, लेकिन जब समय का पहिया घूमता है और कानून का डंडा चलता है, तो सारा रसूख, गुरूर और पैसा 'बदनामी' के रूप में बाहर आ जाता है। अगर आप भी किसी सरकारी पद पर बैठकर खुद को 'भगवान' समझ रहे हैं, तो बेबस और लाचार शालिनी जी की यह रोती हुई तस्वीर अपने मन में बैठा लीजिए, यकीन मानिए दिमाग में पल रहे घूसखोरी के सारे कीटाणु एक झटके में मर जाएंगे। सच्ची प्रतिष्ठा रसूख में नहीं, बल्कि ईमानदारी से किए गए काम में है।