शिक्षा के मंदिर में 'बिल्डर्स' का राज: योग्यता रद्दी में, पैसों से बंटी नौकरियां, और सज़ा के नाम पर अफसरों को मिला सिर्फ एक 'बैड रिमार्क'!

बरेली के बाल वाटिका केंद्रों में 185 एजुकेटर पदों पर हुई भर्ती में जमकर 'खेल' हुआ। मेरिट धरी की धरी रह गई, पैसे वालों को बैकडोर से एंट्री मिली और सज़ा के तौर पर तत्कालीन बीएसए साहब के सर्विस रिकॉर्ड में महज़ एक 'प्रतिकूल प्रविष्टि' दर्ज कर रस्म अदायगी कर दी गई। पढ़िए सिस्टम के इस 'महान' न्याय की पूरी दास्तान।

शिक्षा के मंदिर में 'बिल्डर्स' का राज: योग्यता रद्दी में, पैसों से बंटी नौकरियां, और सज़ा के नाम पर अफसरों को मिला सिर्फ एक 'बैड रिमार्क'!
फोटो: जनवर्ता लाइव

जनवार्ता लाइव

बरेली। अगर आपको लगता है कि इमारतें बनाने वाले सिर्फ ईंट और गारे का काम करते हैं, तो आप उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग के 'इनोवेशन' से अनजान हैं। बरेली में बच्चों का भविष्य संवारने के लिए 'अर्ली चाइल्ड केयर एजुकेटर' खोजने की जिम्मेदारी एक बिल्डर कंपनी को दी गई थी। जी हाँ, 'श्रंगवेद बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड'। शायद विभाग को लगा होगा कि जो नींव अच्छी भरता है, वो बच्चों की शिक्षा की नींव भी अच्छी ही भरेगा—बशर्ते 'कमीशन' की सीमेंट असली हो!

योग्यता को बाहर का रास्ता, 'नोटों' को बैकडोर से एंट्री

पिछले साल जून में बाल वाटिका केंद्रों के लिए 185 पदों पर भर्तियां निकली थीं। योग्य अभ्यर्थी अपनी डिग्रियां और मेरिट लेकर लाइन में खड़े रह गए, लेकिन अंदर 'बैकडोर' से उन लोगों की एंट्री हो रही थी जिनकी फाइल में डिग्रियों की जगह 'गांधी जी' मुस्कुरा रहे थे। 7 जून को हुई काउंसलिंग की जानकारी इतने गुप्त तरीके से छिपाई गई, जैसे वह कोई राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला हो।

सज़ा सुनकर कांप उठेंगे भ्रष्टाचारी!

अब आते हैं इस पूरी फिल्म के सबसे हास्यास्पद हिस्से पर—यानी 'सज़ा'। इस महाघोटाले का पर्दाफाश हुआ। मंडलायुक्त ने जांच बिठाई। जांच में तत्कालीन बीएसए संजय सिंह (जो अब बस्ती में डीआईओएस हैं) और दिवंगत जिला समन्वयक योगेश कुमार को नियमों की धज्जियां उड़ाने का दोषी पाया गया।

अब आप सोच रहे होंगे कि इतने बड़े फर्जीवाड़े के बाद तो सीधे जेल हुई होगी? या कम से कम सस्पेंड तो किया ही गया होगा? जी नहीं! हमारा सिस्टम बहुत दयालु है। सीडीओ देवयानी जी के अनुसार, तत्कालीन बीएसए को सबसे 'खौफनाक' सज़ा दी गई है—उनके सर्विस रिकॉर्ड में एक 'प्रतिकूल प्रविष्टि  दर्ज कर दी गई है। मतलब, एक तरह से डायरी में लाल पेन से लिख दिया गया है कि "बाबूजी ने गंदा काम किया।" बस!

उधर, फर्जीवाड़ा करने वाली बिल्डर कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। कंपनी भी सोच रही होगी कि चलो शिक्षा विभाग से फुर्सत मिली, अब कहीं और पुल या सड़क गिराने का ठेका ले लेंगे।

कुल मिलाकर इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ है सिस्टम में ईमानदारी की कोई जगह नहीं है और भ्रष्टाचार की सज़ा इतनी 'कठोर' है कि भ्रष्टाचारी हंस-हंस कर पेट पकड़ लें। योग्यता बेचकर नौकरियां बांटने वालों के लिए एक 'बैड रिमार्क' तो वैसे भी मेडल के समान ही है।