बरेली के चर्चों में धर्म गुरुओं का 'दोहरा रवैया': मंच पर दूत, बाहर खींचते हैं टांग! दसवंश और निष्ठा पर उठने लगे तीखे सवाल
बरेली के ईसाई समुदाय बहुल क्षेत्र में स्थित चर्चों के पादरियों और विश्वासियों के दोहरे आचरण को लेकर चर्चाएं गर्म हैं। उपदेशों में ईमानदारी सिखाने वाले बाहर आते ही गुटबाज़ी और एक-दूसरे की आलोचना में उलझे दिखते हैं।
मंच पर स्वर्गीय दूत, बाहर नींदा का खेल: बरेली के चर्चों में उपदेशों के पीछे पनप रही गुटबाज़ी!
जनवार्ता लाइव
बरेली। आस्था और विश्वास के केंद्रों से जब उपदेशों के विपरीत आचरण की खबरें सामने आने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में कुछ चर्चों के पादरियों और विश्वासियों के रवैये को लेकर स्थानीय स्तर पर तीखी चर्चाएं छिड़ गई हैं। चर्च के मंच से लोगों को ईमानदारी, प्रेम और त्याग का पाठ पढ़ाने वाले कुछ लोग बाहर कदम रखते ही आपसी खींचतान और नींदा-शिकायत के फेर में पड़ जाते हैं।
'परमेश्वर का भवन' और दसवंश का गणित
धार्मिक मंचों से विश्वासियों को अक्सर प्रेरित किया जाता है कि वे अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ दसवंश व भेंट लेकर आएं ताकि धार्मिक भवन में किसी चीज़ की कमी न रहे। लेकिन अब यही व्यवस्था सवालों के घेरे में आती दिख रही है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा ज़ोर पकड़ रही है कि क्या कलीसिया द्वारा समर्पण भाव से लाया गया दसवंश वास्तव में सही उद्देश्यों में लग रहा है, या फिर निष्ठा का पैमाना ही बदल चुका है? कुछ लोगों का मानना है कि आपसी होड़ और व्यक्तिगत अहम् के कारण मुख्य उद्देश्यों से भटकाव देखने को मिल रहा है।
भीतर दूत का रूप, बाहर आपसी खींचतान
मामला बरेली के एक ईसाई समुदाय बहुल क्षेत्र से जुड़े चर्चों का बताया जा रहा है, जहां नए लोगों को जोड़ने की कवायद तो जारी है, लेकिन अंदरूनी स्थिति कुछ और ही बयां कर रही है। सूत्रों की मानें तो चर्च की सेवाओं के दौरान जो माहौल अत्यंत आध्यात्मिक और अनुशासित दिखता है, परिसर से बाहर आते ही वही माहौल आपसी गुटबाज़ी और आलोचना में तब्दील हो जाता है।
विश्वासियों और मार्गदर्शकों के बीच एक-दूसरे की कमियां निकालने और टांग खींचने का दौर शुरू हो जाता है। खुद को स्वर्गीय दूत की तरह प्रस्तुत करने वाले कुछ लोग चर्च की चौखट पार करते ही अन्य लोगों के खिलाफ बयानबाज़ी में लग जाते हैं।
कथनी और करनी का अंतर
उपदेशों और वास्तविक व्यवहार के बीच का यह अंतर अब छिपा नहीं रह गया है। बरेली के इन घटनाक्रमों का अनकहा गणित यह इशारा करता है कि दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाना जितना आसान है, खुद उस पर अमल करना उतना ही कठिन। जब मार्गदर्शन करने वाले ही आपस में उलझे रहेंगे और विश्वासी एक-दूसरे के विरोधी बनेंगे, तो आस्था के इन केंद्रों की साख पर प्रभाव पड़ना तय है।