डीएम साहब! 6 महीने में 6 किमी भी नहीं पहुंची जांच: 25 लाख के गबन का खेल, फाइलें ही पार कर गईं 'मैडम'!
बरेली के भूमि संरक्षण विभाग में 25 लाख रुपये के गबन का मामला गरमा गया है। डीएम के जांच आदेश के बावजूद अधिकारी अभिलेख चुराकर फरार हो गए और 6 महीने में जांच आगे नहीं बढ़ सकी। जानिए कृषि विभाग के इस बड़े फर्जीवाड़े की पूरी कहानी।
जनवार्ता लाइव
बरेली।
कृषि विभाग के भूमि संरक्षण कार्यालय में भ्रष्टाचार का खेल इस कदर हावी है कि जांच की रफ्तार कछुए से भी बदतर हो चुकी है। 6 महीने बीत जाने के बाद भी फाइलें महज 6 किलोमीटर का सफर तय नहीं कर सकी हैं। फर्जीवाड़े का आलम यह है कि नई आई 'मैडम' (भूमि संरक्षण अधिकारी रश्मि शर्मा) ने बिना श्रमिक चिट्टे जारी कराए ही, उस काम की दोबारा संस्तुति कर दी जिसका भुगतान पहले ही हो चुका था।
इतना ही नहीं, जिस जेई का तबादला आजमगढ़ हो चुका था, उसने चार्ज तक नहीं छोड़ा और मैडम की मेहरबानी से उसके वेतन आहरण की फाइल भी तुरंत क्लियर कर दी गई। तत्कालीन भूमि संरक्षण अधिकारी विनोद यादव की सांठ-गांठ से मनरेगा के ₹1,28,000 के भुगतान में स्थानांतरित संजय कुमार सिंह के नाम का सहारा लेकर दस्तखत ठोंक दिए गए। इस पूरे 25 लाख रुपये के डाके में लेखाकार संजीव कुमार, जेई गीतांजलि आर्य, रश्मि शर्मा और जेई रामकृष्ण की भूमिका मुख्य किरदार के रूप में सामने आ रही है।
राष्ट्रीय स्वरूप में खबर छपने के बाद तेज-तर्रार डीएम अविनाश सिंह ने तत्काल एडीएम सिटी, सीटीओ और जिला कृषि अधिकारी की संयुक्त जांच कमेटी गठित की थी। हालांकि, शुरुआती दौर में जांच अधिकारी व्हाट्सएप-व्हाट्सएप खेलते रहे और तबादला कराकर बहराइच चले गए। बाद में जब मौजूदा एडीएम सिटी ने कड़ाई दिखाते हुए सभी आरोपियों और संजय कुमार सिंह को आमने-सामने बिठाया, तो गबन की पूरी पोल खुल गई।
इसके बाद एडीएम ने रश्मि शर्मा को आदेश दिया कि वे संजय कुमार सिंह को 19 बिंदुओं पर मांगे गए अभिलेख उपलब्ध कराएं। लेकिन सच उजागर होने के डर से मैडम ने नया पैंतरा बदला—वे छुट्टी पर चली गईं, मुरादाबाद तबादला कराया और जेई रामकृष्ण के साथ मिलकर पूरे सरकारी अभिलेख ही गायब कर दिए, ताकि "न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।"
सूत्रों के मुताबिक, विभागीय कर्मचारी जांच को धता बताते हुए आरक्षण का बेतुका तर्क देकर अपनी मनमानी पर आमादा हैं। आलम यह है कि वर्तमान में कार्यालय का प्रभार संभाल रहे उप निदेशक कृषि भी डरे-सहमे हैं और दफ्तर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। अब सवाल यह है कि जब पीड़ित कर्मचारी को 19 बिंदुओं के साक्ष्य ही नहीं मिले, तो वह 3 दिन में अपनी आख्या कैसे दे? डीएम साहब, आपकी नाक के नीचे भ्रष्टाचारी बेखौफ घूम रहे हैं और जांच फाइलें लालफीताशाही की भेंट चढ़ चुकी हैं।